प्रारंभिक जीवन और आध्यात्मिक चेतना

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स्वामी भीष्म जी महाराज का प्रारंभिक जीवन तपस्या और ज्ञान की सतत खोज का साक्षात प्रमाण है। बाल्यावस्था से ही उनकी चेतना ईश्वरीय साधना तथा समाज में व्याप्त कुरीतियों के उन्मूलन की ओर उन्मुख थी। हरिद्वार के शांत वातावरण में उन्होंने वर्षों मौन रहकर वेदों का गहन अध्ययन किया। मेरठ में स्वामी दयानन्द सरस्वती के संपर्क में आने के पश्चात उन्होंने संन्यास की दीक्षा ली और अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र और समाज के पुनरुत्थान में समर्पित कर दिया।